मंगलवार, 28 मई 2024

अंधक वंश से तैयार हुए गोत्र-Andhk vansh se taiyaar huye gotra (आंध आदिवासी-Andh Tribe)



 अंधक वंश से तैयार हुए गोत्र  

1. Andar-अंदार:

Andar (अंदार) Andar (अंदर) Andar (अंदार) Andara (अंदार) Andaira (अंदारिया) Anadariya (अंदारिया) ये सभी नाम जाटव गोत्र के हैं। अंदार गोत्र अंधक वंश से तैयार हुआ है। Andar (अंदार) गोत्र के इतिहास के संबंध में व्ही. एस. दहिया लिखते हैं कि “गन ब्रिटिशों को अंदार यह आदिवासी नाम दिया गया है। वे पश्चिम एशियाई है, वर्तमान में यह क्षेत्र पाकिस्तान में आता है। इस वंश के जाट आज भी पाकिस्तान में पाए जाते हैं. ग्रीक प्रवाशी मैगेस्थनीस ने उनका वर्णन (Andarae) अंदारेय, (Andar, Andhra) अंदार, आंध्रा ऐसे किया हैं। आंध्रा यह शक्तिशाली वंश होकर उसके पास 30 तटबंध की शहरे हैं तो एक लाख सेना दो हजार घोड़े और एक हजार हाथी है।”

2. Andhala (अंधला) जात विकिपीडिया: 

अंधला या अंधरा अंधक वंश के गोत्र है, यह गोत्र जाट गोत्र के नाम से भी परिचित है। अंधला या अंधरा के मूल अंधक राजा माने गए हैं। 

संदर्भ-

1. Jat Itihas Dalip Singh Ahlavat/page no.25

2. Jat History Dalip Singh Ahlavat/ page no. 24

3. Dr. Pem Ram. Rajashtan ke Jato ka Itihas/ page no. 295

4. Mahendra Singh Arya et al.Adhunik Jat Itihas Agra/page no. 225

3. Andhi-आंधी (जात विकिपीडिया):

आंधी यह जाटों का गोत्र है। यह गोत्र अंधक का एक उप गोत्र माना जाता है। आंध विकिपीडिया में और अन्य आधुनिक इतिहासकारों ने आंध समाज की भाषा को आंधी भाषा कहा हैं। इसीलिए आंधी गोत्र व आंध की आंधी भाषा इसमें कुछ साम्य, कुछ संबंध है क्या? इसके बारे में मानववंशशास्त्रियों, भाषाशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों को अधिक संसोधन करने की आवश्यकता है। 

संदर्भ-

1. डॉ. पेम राम- राजस्थान के जाटों का इतिहास. पृष्ठ संख्या. 295 

2. जाट इतिहास- दलीप सिंह अहलावत. परिशिष्ट-1, अ-12 

3. Mahendra Singh Aryaetal Andhunik Jat Itihas. Page no. 225

4. Aundhram-औद्राण:

5. Odra- ओद्र:

Odra (ओद्रा), Odhran ओधरान, Ond ओंद्र, Audhran औधरायन, Othran ओथ्रण, Odhran औद्राण आदि जाटों गोत्र पंजाब में पाए जाते हैं। इसीलिए दलीप सिंह अहलावत कहते हैं कि “ये गोत्र मध्य एशिया में पाए जाते हैं इसीलिए इन गोत्रों का संदर्भ लिया गया है। यह गोत्र अंधक वंश की एक उप शाखा मानी जाती है। भागवत पुराण के अनुसार ययाति वंश के बेटे का वंश कई पीढियों से इस गोत्र का प्रमाण है।” बलि को छ पुत्र थे। अंग, बंग, कलिंगा, शंभू, पुन्द्रच और ओद्र (Odhra)। महाभारत में उल्लेखित आदिवासी ओद्र (Odhra) आज के ओड़िसा में रहने वाले हैं। उनकी पहचान उत्कल और कलिंगा नाम से भी है।

पण्डअयांशच थरविथांश चैव सहितांश चोद्र केरलै:

अन्ध्रांश तलवनांश चैव कलिंगगाण ओष्ट कर्णिकान

(1128.48). सभ पर्वा में (1147-19)

औद्रान का निम्नलिखित उल्लेख आया हुआ है-

चीनान हुनात्र शकान ओड्रान पर्वतान्तरवासिन

वाश्नोयान हारहुनांशच कृष्णान हैमवतांस तदा (1147-19)

पंजाब में इस गोत्र के लोग होशियारपूरी जिले के दसुया तहसील में रहते हैं। 

संदर्भ-

1. History Dalip Singh Ahalavt

2. V.S.Dahia जाट के प्राचीन शासक

3. Jat History Dalip Singh Ahalavat

4. Mahendra Singh Arya-Adhunik Jat Itihas. Page no. 224

5. Jat The Ancient Ruler (A Clan Study) Jat Clan In India. page no. 267

6. Mahabharata chap.47

7. Dalip Singh Ahlawat : Jat Veero Ka Itihas 

6. Ondhru (Redirected from Aundhru):

Andhru ओंध्रू, Aundhru (ओंध्रु) ये एक जाट गोत्र है। ओंदू व् औन्ध्रु का मूल अंधक वंश है।

संदर्भ-

1. Jat History Dalip Singh Ahlavat/Parishist-1.S.N.O.19

2. Mahendra Singh Arya Et.Al-Adhunik Jat Itihas agara-1998. Page no. 225-29

7. Oka-ओक:

ओक यह एक जाट गोत्र है। वह समूह अपने-आप को अंधक वंश का  वंशज मानता है। इस वंश का उत्तर भारत और मध्य एशिया में निवास का महत्वपूर्ण इतिहास रहा है। अब तक हमने पुराण, महाभारत, समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के अनुसार अंधक, वृष्णी और कुकुर वंश के पारिवारिक व वांशिक संबंध देखे हैं। महाभारत में अंधक और वृष्णी यह जातियाँ या वंश आदिवासी होने का प्रमाण बार-बार मिलता है। यह सभी वंश आर्यवर्त प्रदेश के हैं। आर्यों का उत्तर भारत में आगमन के बाद वहाँ के मूल जनजातियों के राजाओं से संघर्ष होना सहजता की बात है। इस कारण आर्यों का आर्यत्तर जनजातियों के राजाओं के साथ युद्ध होने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथ, वेद, पुराणों से पता चलता है। महाभारत, पुराणों और शास्त्रों के आधार पर अंधक व वृष्णी यह आदिवासी जनजातियाँ होकर वह प्रमुखता से गणतंत्र और लोकतंत्र प्रणाली से शासन करने वाले लोग थे। कुछ भागों में राजतंत्र वंशपरंपरागत चलने वाली राज्य व्यवस्था थी। इसके भी संदर्भ हमें प्राचीन साहित्य से मिलते हैं। प्राचीन साहित्य का अवलोकन करने के बाद पता चलता है कि आर्यों के आगमन के बाद गणतंत्र शासन प्रणाली की जगह राजतंत्र, एकतंत्र या हुकूमत प्रणाली ने ली हुई दिखाई देती है। अपनी मातृभूमि का संरक्षण करने के लिए मूलनिवासियों ने बहुत प्रयास किया हुआ दिखता है। किंतु इसमें यहाँ के मूलनिवासियों का भोलापन, इमानदारी और कुछ स्थानिक मूलनिवासी जनजातियों के कारण आर्यों ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजकीय वर्चस्व निर्माण किया हुआ दिखाई देता है। बार-बार राजकीय, सामाजिक व सांस्कृतिक अस्थिरता के कारण यहाँ के स्थानीय जनजातियों ने सतत भ्रमण करके कई प्रदेशों में नई बस्तियाँ और राज्य निर्माण किया हुआ दिखता है। उत्तर भारत से दक्षिण भारत में स्थलांतरित की हुई जनजातियों में से एक जनजाति ‘आंध जनजाति’ है। इसके संदर्भ मनुस्मृति, वेद और पुराणों में देखने को मिलते हैं। ऋग्वेद के ऐतरेयब्राह्मण ग्रंथों में आंध जनजाति उत्तर भारत से दक्षिण भारत में स्थलांतरित की हुई जनजाति मानी जाती है। इसी प्रकार से आंध्र वंश के आंध वंश है, इसकी विस्तार से जानकारी प्रस्तुत अध्याय में देखी गई है। जाट इतिहासकारों ने यह प्रतिपादित किया हैं कि अंधक वंश ही आंध्र वंश है। इसका अध्ययन प्रस्तुत लेख में किया गया है। 

आंध्र प्रदेश के आधुनिक इतिहासकार श्री इटुकरी बलराम मूर्ति ने अपनी पुस्तक ‘आंध्र संक्षिप्त चरीत्र’ में लिखा है कि आंध्र जनजाति यह मूलतः आर्यवर्त उत्तर भारत की है। यह जनजाति महाभारत काल से (इ.स.पूर्व 1500) ही यमुना नदी के किनारे निवास करती आई है। यह जनजाति दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जनजातियों में से प्रमुख जनजाति है। 

रामायण में कई बार आंध्र का उल्लेख आया हुआ है। जब हनुमान सीता का शोध लेने निकले थे तब उन्होंने अपना एक गुट आंध्र देश की ओर भेजा था। फिर सभी के मन में प्रश्न खड़ा हो जाता है कि आंध्र जनजाति किस आदिवासी जनजाति की वंशज है। रामायण और महाभारत में सलगता है। इसीलिए ‘अंधक’ का ‘आंध्र’ बना है। इसके संदर्भ इतिहासकार देते हैं। ‘अंधक’ व ‘आंध्र’ के मूल वंशज आंध्र ही है। रामायण पूर्व काल को देखा जाए तो आर्यों के आगमन के बाद आर्यों-अनार्यों का संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में आंध्र के एक गुट ने दक्षिण भारत आंध्र प्रदेश में स्थलांतर किया। इस कारण इस प्रदेश का नाम आंध्र प्रदेश पड़ा है। ऐसे कई संदर्भ रामायण में मिलते हैं। क्योंकि आधुनिक इतिहासकारों ने इस बात को अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की है। कुछ इतिहासकार का कहना हैं कि आंध्र वंश के कुछ गुटों ने आर्यों के साथ दोस्ती के संबंध बनाकर वह स्थलांतर होने के बजाय उसी जगह पर रह गए। कुछ इतिहासकार ‘कलिंग’ व ‘वाड़ीयार’ आंध्र वंश की उपशाखा होने के प्रमाण देते हैं। इन सभी प्राचीन और आधुनिक साहित्य के प्रमाणों से हम कह सकते हैं कि अंधक, कलिंगा, वाड़ीयार और सातवाहन ये सभी वंश मूलतः अंधक व आंध्र वंश के ही हैं। भाषाविज्ञान के अनुसार अंधक व आंध्र का रूपांतरण ‘आंध’ होना स्वाभाविक है। वास्तव में इस बात को साबित करने के लिए हमने वैदिक साहित्य, पुराण, महाभारत, रामायण और अधुनिक इतिहासकारों के विविध मत प्रवाह देखे हैं।

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संदर्भ:

तुकाराम भिसे-आंध जमातीचा प्राचीन वांशिक व राजकीय इतिहास 



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