आंध जनजाति का अंधक वंश
प्रत्येक मनुष्य को और उसके समूह को हम कौन हैं? यह प्रश्न हमेशा पड़ता रहता है। ऐसा प्रश्न ‘आंध जनजाति’ को पड़ना भी स्वभाविक है। आंध जनजाति के पूर्वज या वंशज कौन हैं? आंध जनजाति के कुलवंश कौनसे हैं? हमारा सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक इतिहास कौनसा है? इसका शोध लेते समय प्राचीन इतिहास के संशोधकों के अनुसार ‘आंध जनजाति’ के पूर्वज अंधक आंध्र, आंध्रभ्रत्या, शालीवाहन, सातवाहन, आंध्र इक्ष्वाकु हैं। ऐसे विविध नामों की पहचान प्राचीन साहित्य, शिलालेख और सिक्कों के आधार पर हुई हैं। इसके आधार पर ही वर्तमान ‘आंध जनजाति’ के पूर्वज या वंशज कौन हैं इसका निश्चित ही अनुमान निकलता है। आंध्रवंश, सातवाहन राज्य और इक्ष्वाकु राज्य इस संदर्भ में स्वतंत्र अध्याय में विस्तार से अध्ययन किया है। इस अध्याय में अंधक वंश और आंध जनजाति का वंश के संबंध की खोज करने का प्रयास किया गया है।
महाभारत के युद्ध में अनेक जनजातियों ने भाग लिया था। उसमे ‘अंधक’ (आंध) यह एक प्रमुख जनजाति है। आंध जनजाति अंत तक कौरवों के साथ लड़ी। उत्तर भारत के इतिहासकारों ने कई जाटों को आंध (अंधक) और आंध्र यह दो जनजाति को जाट समाज के लोग अपने गोत्र मानते हैं। ऐसे उनके अनेक ग्रंथों में उल्लेखित किया हैं। आंध जनजाति महाभारत युद्ध के पूर्व ही उत्तर भारत से दक्षिण भारत में स्थलांतर होकर होने के संदर्भ प्राचीन ग्रंथों में हैं।
इस अध्याय में अंधक व आंध्र यह दो जनजाति के लोग मूल एक ही हैं? इसके अध्ययन की ख़ोज करने का प्रयास किया हैं। वर्तमान समय की आंध जनजाति यह जनजाति आंध्र जनजाति के ही वंशज हैं ऐसे विचार कुछ इतिहासकारों को छोड़कर अन्य सभी इतिहासकारों व मानववंशशास्त्रज्ञों ने मान्य किए हैं।
अंधक व आंध्र यह मूल में आर्यवृत याने कि उत्तर भारत की प्रमुख जनजातियाँ थी। अनेक इतिहासकारों ने अंधक व आंध्र जनजातियों को जाटों के गोत्र होने का प्रतिपादित किया हैं। अंधक व आंध्र अगर यह दोनों जाटों के गोत्र हैं तो इन दोनों के वंशज और कुल भी एक ही होने चाहिए। इसकी ख़ोज करने की कोशिश की गई है।
यादव वंश के मधु के वंशज भीम (सातवत) इनका पुत्र ‘अंधक’ है और उनके भाई का नाम महाराज वृष्ण था। अंधक पुत्र से अंधक वंश प्रसिद्ध हो गया। हुकुम सिंह पानवर इस इतिहाकार ने अंधक से उत्पति के निम्नलिखित गोत्र यह जाट समाज के है ऐसा कहा हैं-
1. अंदार - Andar
2. अंधला - Adhala
3. आंधी - Andhi
4. औन्ध्राण - Aundhran
5. औंध्रु - Aundhru
6. औद्राण- Ordhran
7. ओका - Oka
8. ओंध्रा – Ondhara
प्राचीन साहित्य और प्राचीन इतिहासों के इतिहासकारों के अनुसार अंधक वंश का इतिहास निम्नलिखित दिया है-
1.अंधक वंश
अंधक यह यादवों की शाखा है। मधु वंश में अनेक पीढ़ियों के बाद भीम हुआ। भीम सातवत के दो बेटे थे। एक अंधक और दूसरा महाराजा वृष्णी। वृष्णी वंश में वृष्णी के अनेक पीढ़ियों के बाद ‘शूर’ राजा बना। उसने शोरपुर राज्य की स्थापना की। शूर के बेटे का नाम वसुदेव था। वसुदेव को बलराम और कृष्ण ये दो बेटे थी। कृष्ण यह वृष्णी वंशीय यादव है। अंधक वंश के बारे में अधिक विस्तार से जानकारी आगे दी हुई है।
अंधकों के आगे की पीढ़ियों को ‘अंधक वंश’ नाम से जाना जाता है। अंधक यह ‘सुरसेन’ जनपथ गणराज्य का अध्यक्ष था। अंधकों के कई पीढ़ियों के बाद ‘कुकूर’ हुआ। कुकुरों के आगे की पीढ़ियों में ‘आहुक’ हुआ। आहुक को उग्रसेन व देवक यह दो बेटे थे। उग्रसेन के बेटे का नाम कंस था। देवक की बेटी का नाम देवकी था। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ। देवकी यह कंस की सौतेली बहन थी। इसीलिए कंस और कृष्ण का नाता वर्तमान पद्धति से मामा-भांजे था। तत्कालीन समय के महाबलशाली जरासंध यह मगध का राजा था। उनके पास बहुत ही सैन्यदल था। इस शक्तिशाली जरासंध के दो बेटियों के साथ कंस का विवाह हुआ था।
2.वृष्णी और अंधक का संघ
मधु राजा के सौ पुत्रों में से वरिष्ठ पुत्र का नाम यादवराज था। इसी वंश में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसी वंश को वृष्णी वंशीय यादव कहा जाता है।
वृष्णी गणराज्य शूरसेन प्रदेश में था। वृष्णी और अंधक का प्राचीन ग्रंथों में आपस में संबंध आता है। पाणिनि में वृष्णी और अंधक का उल्लेख हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वृष्णी राज्य का संदर्भ है। महाभारत में भी वृष्ण-अंधक का संदर्भ हैं।
इसी प्रसंग के अनुसार कृष्ण को इस राज्य का प्रमुख कहते हैं। इसीलिए यह स्पष्ट होता हैं कि वृष्णी और अंधक गणजातीय राज्य थे। ‘वृष्णी राजज्ञागणस्य भुभरस्य’ यह सिक्का इस गणराज्य में प्रचलित किया था।
अंधक और वृष्णी यह राज्य संभवतः यदुवंशी राजा भीम सातवत के पुत्रों के नामों से पड़ा होगा। कृष्ण वृष्णी थे तो उग्रसेन कंस अंधक थे। कुछ ग्रंथों में कृष्ण को अंधक कहा गया है।
मथुरा अंधक राज्य की राजधानी थी और द्वारका वृष्णियों की राजधानी थी। श्रीराम के बाद अयोध्या पर कुश व युवराज थे। उसी समय मथुरा पर सातवत का पुत्र अंधक राज्य कर रहा था। उसके बाद अंधक वंश के राज्य मथुरा पर थे।
भीम सातवत के दूसरे बेटे का नाम महाराजा वृष्णी थे। इनके वंश में उत्पन्न शूर ने अपने स्वतंत्र राज्य शोरपुर में (वर्तमान बटेश्वोर) स्थापन किया। शूर के बेटे का नाम वसुदेव था। वसुदेव को दो बेटे थे एक बलराम और दूसरा कृष्ण। वैदिक साहित्य में उत्तर पांचाल के पौरवराजा दिवोदास और उनके वंशज सुदास के जीत का संदर्भ है। सुदास ने हस्तिनापुर के राजा संवरण को उनके साथ के नौ राजाओं के विशाल सैन्य को परास्त कर विजय प्राप्त किया था। इन दस राजाओं के भीषण संघर्ष को ‘प्राचीन दसहराज’ युद्ध भी कहा जाता है। सुदास से पराजित नौ राजाओं में से एक राजा यादव था।
श्रीकृष्ण दास वाजपेयी के अनुसार यादव राजा भीम सातवत का पुत्र अंधक होगा। जो कि सुदास के समय में यादवों की मुख्य शाखा प्रमुख और शूरसेन जनपद का तत्कालिक गणराज्य का अध्यक्ष होगा। वह अपने पिता के समान पराक्रमी नहीं होगा।
अंधक का भाई वृष्णी को दो पुत्र थे। एक देवमिंढ और दूसरा युधाजित। देवमिंढ को दो पुत्र थे। श्रपल्ल्व और अक्रूर। इसी वंश को वृष्णीवंश कहा जाता है। अंधक और वृष्णी वंश के शूरसेन के प्रदेश में मथुरा व शौरीपुर दो पद्धति के गणराज्य थे। उनकी राज्य पद्धति वंश परंपरागत न होकर समय समय पर जनतांत्रिक पद्धति से प्रतिनिधि चुनकर चलती होगी। वे अपने-अपने वंश के मुख्य प्रतिनिधि थे और उनको राजा कहते थे।
महाभारत युद्ध के पूर्व इन दो राजाओं का संघ था। जो कि अंधक-वृष्णी संघ इस नाम से जाना जाता था। उस संघ का प्रमुख आहुका का पुत्र उग्रसेन था। वृष्णियों के शूर पुत्र वसुदेव थे। इस संघ राज्य का राष्ट्रपति उग्रसेन था। इस केंद्रीय मंत्रीमंडल में एक उद्धव था। उग्रसेन के भतीजी देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था। वसुदेव को दो पुत्र थे। एक बलराम और दूसरा कृष्ण। उग्रसेन के पुत्र का विवाह उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य मगध साम्राज्य के अधिपति जरासंध की दो बेटियों के साथ हुआ था। वसुदेव की बहन कुंती का विवाह कुरु प्रदेश के प्रतापी राजा पंडू के साथ हुआ। पंडू को पांच पुत्र थे। वही प्रसिद्ध पांडव हैं। वसुदेव की दूसरी बहन श्रुतश्रवा चेदिराज दमघोष व्याही थी। जिसका पुत्र शिशुपाल था। इस प्रकास शूरसेन प्रदेश के यादवों का भारत के कई प्रख्यात राजाओं से परिवारिक संबंध थे। उग्रसेन का पुत्र कंस बड़ा ही पराक्रमी व महत्वकांक्षी युवक था। उसको अपने ससुर जरासंध के विशाल सैन्यदल का स्वाभिमान था। वह गणतंत्र प्रणाली को न मानकर राजतंत्र प्रणाली को मानता था। उसने अपने साथियों को साथ लेकर संघ राज्यों पर राज करने की शुरूआत की। उसने अपने और ससुर के बल सहयोग से खुद का पिता उग्रसेन व बहनोई वसुदेव को शासनाधिकारों से वंचित रखा। अंधक वंशी संघ का वह स्वेच्छाचारी राजा बना। वो यादवों का द्वेष करता था और खुद को यादव कहने में भी उसे शर्म लगाती थी। वह मद्यंध होकर प्रजा पर अन्याय-अत्याचार करता था। अंत में श्रीकृष्ण ने भीम की मदद से उसका वध किया।
3.The Mahabaharata Tribes Jatland Wiki
महाभारत में कौरवों की ओर से लड़ने वाली आदिवासी जनजाति में अंधक यह एक प्रमुक जनजाति थी। यह एक यादवों की ही एक शाखा है। अंधक महाभारत में क्रतवर्मा के नेतृत्व में कौरवों की ओर से युद्ध लढ़े थे।
महारढौर अंधक वृष्णीभौजे
सौराष्ट्रमैरतैरआतशस्त्र:।
ब्रहथ्वल: कृतवर्माभिगुप्तेवल तवथीय धसिणती भिपाती।
महाभारत सभापर्वा में अंधक राजा का संदर्भ आया हुआ है। दैत्यराज वर्षपर्वा की सभा में उपस्थित राजाओं में कक्षसेन, अंग, वंग, पूंडुक, अंधक पाण्ड्य, उड़ीसा आदि राष्ट्रों के अधिपति राजे युधिष्ठिर की सेवा के लिए उपस्थित थे। महाभारत के उद्योग पर्वा में भोज, अंधक और कुकूर वंशीय यादवों के साथ एक अक्षौहिणी सेना लेकर दुर्योधन के पास उपस्थित थे। इसी स्थान पर अंधक राजा ने कौरवों का पक्ष लिया था। उद्योग पर्वा में पांडवों का पक्ष लेने के लिए इकट्टा हुए राजे, राजपुत्र, वृष्णी और अंधक वंश के सभी यादवों के सामने श्रीकृष्ण कर्ण को कहते हैं कि तुमने पांडवों का पक्ष लेने पर तुम्हारे ये सब राजे, राजपुत्र व वीर चरण स्पर्श करेंगे। इसी समय अंधक वीर पांडवों के समर्थन में एक हुए ऐसा स्पष्ट था।
उद्योग पर्वा में दुर्योधन ने कौरवों के सैन्य के लिए विशेष बुद्धिमानी और शूरवीर पुरुषों को एक अदौहीनी सैन्य के लिए एक इस प्रमाण से ग्यारह अदौहीनी सैन्यदल के लिए 11 सेनापतियों की नियुक्ति की। उसमें कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, शल्य, जयद्रथ, सुद्क्षिना, कृतवर्मा, अश्वस्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शकुनी और बाहिक इनका समावेश था। इसमें अंधक वंश के कृतवर्मा सेनापति थे। यानि की अंधक वंश का शूरवीर सेनापति कौरवों की ओर से प्रत्यक्ष युद्ध में स्वामिल हुए थे ऐसा दिखाई देता है।
महाभारत में मुसल पर्वा में अंधक वंश के बारे में अधिक विवरण आया है। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब 36 वां वर्ष शुरू हुआ तब राजा युधिष्ठिर को अनेक अपयश दिखने लगे थे। गांधारी ने श्रीकृष्ण को दिया हुआ शाप की तरह महाभारत युद्ध के बाद 36 वर्ष के बाद यादववंश आपस में लड़कर होंगे। यह शापवानी सच में होने के परिणाम थे। इसी परिणाम को देखकर यादव वीर श्रीकृष्ण का पुत्र सांबा को लेकर महर्षि विश्वामित्र, किंव, तपोधन, और नारदजी के पास गए। उन ऋषियों ने बताया कि यह श्रीकृष्ण का पुत्र सांब वृष्णी और अंधकवंशी पुरुषों का विनाश करने के लिए कई भयंकर शूरवीरों तैयार करेगा। जिनके माध्यम से तुम जैसे दुराचारी, क्रूर और क्रोधी लोगों का समस्त कुल वंश का विनाश करेंगे।
दूसरे ही दिन सांब के शूरवीर पुत्र का जन्म हुआ। यादवों ने इसकी सूचना राजा उग्रसेन को दी। इसके बाद उग्रसेन, श्रीकृष्ण, बलभद्र, बभ्रुदी इनके आदेश के अनुसार नगर में घोषणा दी गई कि आज के बाद कोई भी नगरवासी वृष्णी और अंधक वंश में दारू एवं मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो छुपके से यह सब करेगा उनको अपने सभी भाइयों के साथ सूली पर चढ़ाया जाएगा।
4.यादव वंश का संहार
यादवों के बैठक में बैठे हुए सात्याकी उन्मत होकर कृतवर्मा को आदर के साथ कहने लगे कि हर्दिक्य ऐसा कौनसा वीर खुद क्षत्रिय कह कर जो मुर्दों की स्थिति में सोये मनुष्य की तुम्हारे जैसी हत्या करेगा। तुम्हारे हाथों से जो अन्याय हुआ है उसे यादव वंश कभी भी माफ़ी नहीं करेगा। सात्याकी ने ऐसा कहने के बाद प्रद्युम्न ने भी कृतवर्मा का अपमान करके सात्याकी का अनुमोदन किया। यह सुनकर कृतवर्मा को बहुत ही घुस्सा आ गया उन्होंने क्रोध में बाया हाथ ऊपर करके सात्याकी का तिरस्कार करते हुए बोले कि-“अरे भूरिश्रवा के हाथ कटाए हुए थे व मरणोपरांत उपवास करने की इच्छा करके बैठा था। इस अवस्था में भी तुमने खुद को वीर समझके यह निर्घूण हत्या कैसी की।” उसकी बात सुनकर सात्यकी घुस्से में आया और खड़े होकर बोलने लगा कि-“मैं सात्यकी शपथ लेता हूँ कि आज इस बच्चे को मारकर द्रोपदी के पांच पुत्र और शिखडी के पास जाऊँगा।” ऐसा कहकर सात्यकी घबराए। इसके बाद वह अन्य वीरों का प्राण ले रहे थे। यह देखकर भगवान श्रीकृष्ण उसे रोकने के लिए गए। इसी समय में कालवंश की महिमा से भोज व अंधक वंश के वीरों में एकमत होकर उन्होंने सात्याकी को चारों बाजुओं से घेरा। वे सात्यकी को बचाने के लिए भोजवंशी वीरों के साथ मिलें। अपने बाहुओं के बल पर ये दोनों भी वीर उत्साहित होकर परिश्रमा के साथ लड़ने लगें। परंतु भोज और अंधक वंश की संख्या अधिक होने के कारण उनको परास्त नहीं कर पाए। अंत में श्रीकृष्ण के आँखों के सामने दोनों ही मारे गए। अपना पुत्र और सात्यकी मारे गए यह देखकर उन्होंने गुस्से में आकार घांस उखाड़ना शुरू की उसका रूपांतर लोहे में हुआ। इसी समय काल परिस्थिति के अनुसार अंधक, भोज, शिनी और वृष्णी वीर वंश आपस में ही लड़ते-लड़ते कालवश हो गए। पुत्र-पिता के साथ और पिता-पुत्र के साथ लड़ते-लड़ते प्राण ले रहे थे। यदुवंशी आपस में लड़ते-लड़ते पतित (मर जाना) हो गए। कुकूर और अंधक वंश के योद्धें आग में पड़ने वाले पतंग की तरह जल रहे थे।
उत्तर भारत के अनेक विद्वान् और इतिहासकारों ने अंधक और आंध्र वंश को जाटों के गोत्र होने के प्रमाण देकर सिद्ध करने का प्रयास किया हैं। उसमें वी. एस. दहिया, दिलीप सिंह अहलावत, महेंद्रसिंह आर्य, हुकुम सिंह पनवर, ठाकुर देशराज आदि विचारक हैं। उन्होंने अंधक यह जाटों के गोत्र होने के स्पष्ट बताया हैं। अंधक यादव वंश के शाखाओं के गोत्र इस प्रकार बताए हैं-
1. वृष्णी
2. अंधक
3. हाला
4. शिवस्कंदेत- सौकंदे
5. डागुर-डागराणा
6. खिरवार-खरे
7. बलेहार
8. सारन
9. सिनसिनवाल
10. छोकर
11. सोगरवार
12. हांगा घनिहार
13. भोज
महाभारत में उल्लेख आया हुआ गंधक महाराजा वृष्णी का भाई था। अंधक के पिता का नाम भीम सतवत था। यह यादवराज यदु के वंशज थे। अंधक वंश अंधका से प्रचलित हुआ। महाराजा अंधक से शुरू हुआ अंधक वंश जाटों के गोत्र हैं।
हुकुम सिंह पवनर के मतानुसार “भरतपुर का राज्य यदुवंश से ही शुरू था। श्रीकृष्ण हा 43 वें क्रमांक के वंशज तय किए हैं। श्रीकृष्ण के पहले अंधक 34 वें क्रमांक के वंशज हैं।”
धार्मिक इतिहासकारों के अनुसार मथुरा यह वृष्णी, अंधक व भोज वंशीय राजधानी थी। इनको सर्वसामान्यतः यदु के बाद यादव वंश से पहचान मिली। मथुरा के जनपड़ा के उत्तर दिशा पर अंजाई नामक स्थान है। उस स्थान पर अंधक वंश के लोग रहते थे। ठाकुर देशराज लिखते हैं कि “श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अंधक व वृष्णी वंश के लोगों को संगठित करके ज्ञाति राजा की स्थापना की। यह लोग मथुरा के उत्तर व आज के अंजाई नामक स्थान पर अपना गणतंत्र प्रणाली अनुसार शासन कर रहे थे। साम्राज्यवादी जरासंध को त्रासद होकर वृश्नीयों के साथ द्वारका में जाकर रहने लगे। राजपूतन मार्ग से फिर संयुक्त प्रदेश में कब आए हैं यह बता नहीं सकते हैं किंतु वर्तमान में वे औंध, अंतल, अनकल नाम से पहचानने लगे। भाषाशास्त्र के अनुसार अंधक शब्द का औंध, अंतल और अनकल बनाना आसान है।” (जाट इतिहास-ठाकुर देशराज. पृष्ठ संख्या. 558)
यहाँ पर भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोण से आंध वंश का प्राचीन कालीन अध्ययन करते समय अंधक का औंध, आंध्र व आंध्रा का आंध शब्द बन गया है। इस कारण से आंध यह अंधक व आंध्र राजा के वंशज है इसको सिद्ध करना आसान हो गया है। इसकी जानकारी हम आगे वाले अध्याय में देखने वाले हैं। अभी हम अंधक व जाट से संबंधित उत्तर भारत के विद्वानों के विचारों संदर्भ देखेंगे।
5.अंधक का मथुरा से द्वारका में स्थलांतरण
कंस का ससुर जरासंध अमाप सेना लेकर मथुरा पर बार-बार आक्रमण कर रहा था। उन्होंने सत्रह बार मथुरा पर आक्रमण किया था। 17 वें आक्रमण को श्रीकृष्ण ने उनका पराजय किया। किंतु 18 वें आक्रमण को उन्होंने बड़ी अमाप सेना लेकर तैयारी के साथ मथुरा पर आक्रमण किया। ‘कालयवन’ राजा के साथ तीस करोड़ सेना की मदद लीं। इस समय श्रीकृष्ण ने हो रही जीवहिंसा को देखते हुए मथुरा छोड़ने का संकल्प लेकर मथुरा से द्वारका नगरी की ओर जाने का निर्णय लिया। उनके साथ अंधक, वृष्णी व भोज वंश के लोग थे।
संदर्भ-
1.Jat History-दलीप सिंह/परीक्षित
2.Jat History-Thakur Deshraj/Chapter 8 पृष्ठ संख्या. 585
3.जाट वीरों का इतिहास- दलीप सिंह अहलावत. पृष्ठ संख्या. 187
4.Bhaleram Beniwal : Jaton ka Adhunik Itihas, Jaypal agencies Agra 2005. page no. 152
5.Mahendra singh Arya et A) Adhunik Jat Itihas.
6.The Jat : Their Origin Antiquity and migrations/Appendices/Appendix no.1
7.Yadu vanshavali of Bhartpur given by gana singh in his book Yadu vamsa part-1 Bharapur Rajvansa ka Itihas (1637-1968). Bhartpur.1967 page no. 19-20
8.Genealogy of yadavas (http/www.vvam.umd.edu/-vionds/genealogy.jpg)
9.Mahendra singh arya et.al Adhunix Jat Itihas page. 225
10.Mahabharata-krishna-Narad Uvach.
11.Myths andh legends of the Hindus and bhuddhists.
12.Thakur Deshraj : Jat Itihas. Page no. 106-109

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